मार्गशीर्ष कृष्ण (उत्पन्ना) एकादशी व्रत कथा

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पुराणों के अनुसार ग्रहण के समय स्नान दान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, उससे कहीं ज्यादा पुण्य एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। एकादशी का व्रत करने वाले के दस पुरुषा पितृपक्ष के दस पुरुषा मातृपक्ष के और दस पुरुषा पत्नी पक्ष के व्रत करता को शुभ आशीर्वाद देते हुए वैकुण्ठ को जाते हैं।

व्रत कथा-

एकादशी के जन्म की कथा भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी, सतयुग में मुर नाम का एक महाभयंकर राक्षस प्रकट हुआ, जिसने देवताओं पर विजय प्राप्त कर उनको अमरावती पुरी से नीचे गिरा दिया। देवता मृत्यु लोक में आकर एक गुफा में निवास करने लगे। सभी देवता भगवान शंकर की शरण में गए वहाँ जाकर उन्होंने दैत्यों के अत्याचारों का तथा अपने दुखों का वर्णन किया। भगवान शंकर ने देवताओं से कहा की वह सभी भगवान विष्णु की शरण में जायें। भगवान शंकर की आज्ञा पाकर सभी देव क्षीर सागर में गए, वहाँ भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर शयन कर रहे थे। सभी देवताओं ने वेद मंत्रों द्वारा स्तुति करके भगवान विष्णु को प्रसन्न किया। प्रार्थना के बाद इंद्र देवता ने भगवान को मुर राक्षस के अत्याचारों के बारे में बताया तथा भगवान से प्रार्थना की की वह उस बलशाली दैत्य को मारकर देवताओं के दुःख को दूर करें।

भगवान बोले ! हे देवताओ – मैं तुम्हारे शत्रु का शीघ्र संहार करूंगा, आप निश्चिन्त होकर चंद्रावती नगरी पर चढ़ाई करो, मैं पीछे से तुम्हारी सहायता करने आऊंगा। भगवान विष्णु की आज्ञा पाकर सभी देव वहाँ आये जहाँ युद्ध भूमि में मुर दैत्य गरज रहा था। युद्ध प्रारम्भ हुआ पर देवता मुर दैत्य के सामने पलभर भी न ठहर पाए। भगवान विष्णु भी आ पहुंचे, और सुदर्शन चक्र को शत्रुओं का संहार करने की आज्ञा दी।

भगवान विष्णु की आज्ञा मनाकर सुदर्शनचक्र ने सभी दैत्यों का संहार कर दिया, परन्तु मुर दैत्य का सर नहीं कटा। भगवान विष्णु का सारंग धनुष भी मुर दैत्य को नहीं मार सका। भगवान विष्णु ने अब दैत्य मुर के साथ हजारों वर्षों तक कुश्ती की परन्तु भगवान का कोमल शरीर मुर दैत्य के पर्वत के सामान कठोर शरीर का कुछ भी नहीं बिगाड़ सका और अंत में भगवान् शत्रु को पीठ दिखाकर भाग गए। भगवान अपनी विश्राम भूमि बद्रिकाश्रम में स्थित गुफा जिसका नाम हेमवती था, में जाकर सो गए। दैत्य मुर भी भगवान का पीछा करता हुआ गुफा के भीतर आ गया और सोते हुए भगवान पर अस्त्र से प्रहार करने लगा। उसी समय भगवान के शरीर से एक सूंदर कन्या उत्पन्न हुई जिसके हाथों में दिव्यास्त्र थे। उस कन्या ने मुर के अस्त्र – शस्त्रों को टुकड़े – टुकड़े कर दिया, रथ भी तोड़ दिया। फिर भी उस दैत्य ने पीठ नहीं दिखाई कुश्ती के लिए कन्या उस दैत्य के समीप आयी और उसे धक्का मारकर गिरादिया और कहा –  यह मल्लयुद्ध का फल है।  जब दैत्य उठा तो उस कन्या ने दैत्य का सिर काटकर कहा – कि यह हठ योग का फल है।

मुर की मृत्यु के पश्चात उसकी सेना पाताल भाग गयी। भगवान निंद्रा से जागे तो कन्या बोली – यह दैत्य आपको मारने की इच्छा से आया था। मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इसका वध कर दिया। भगवान प्रसन्न होकर बोले – तुमने सभी देवताओं की रक्षा की है, इसलिए मैं तुम्हें वरदान देता हूँ, तुम्हें जो भी वरदान चाहिए माँग लो। कन्या ने कहा प्रभु – जो भी मनुष्य मेरा व्रत करे उसके घर में दूध, पुत्र, धन का विकास रहे और अंत में आपके लोक को प्राप्त करे। भगवान बोले – तुम एकादशी तिथि को उत्पन्न हुई हो इस कारण तुम्हारा नाम एकादशी प्रसिद्ध होगा। जो श्रद्धा और भक्ति से तुम्हारे व्रत को करेगा, उन्हें सभी तीर्थों के स्नान का फल मिलेगा। तुम्हारा यह व्रत सभी पापों को नष्ट करने वाला होगा। पतित – पावनी विश्व – तारनी का जन्म मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष में हुआ। इस कारण इसका नाम उत्पन्ना प्रसिद्ध हुआ।

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