मथुरा एवं वृन्दावन के प्रमुख धार्मिक तीर्थ स्थल

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मथुरा उत्तर प्रदेश राज्य का एक जिला है। यह ऐतिहासिक एवं धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। मथुरा भगवान् श्रीकृष्ण के जन्म स्थल के लिए भी  प्रसिद्ध  है। मथुरा के चारों और चार शिव मंदिर हैं। पूर्व में चकलेश्वर महादेव ,दक्षिण में रंगेश्वर महादेव, उत्तर में गोपेश्वर महादेव, और पश्चिम में भूतेश्वर महादेव का मंदिर है। चारों दिशाओं में स्थित होने के कारण शिवजी को मथुरा का कोतवाल भी कहा जाता है। आज भी महाकवि सूरदास, संगीतज्ञ स्वामी हरिदास, स्वामी दयानन्द, कवि रसखान, आदि महान कवियों से इस नगरी का नाम जुड़ा हुआ है।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि

मथुरा भारत का प्राचीन नगर है। यहाँ से 500 ईसा पूर्व के प्राचीन अवशेष मिले हैं। जिससे इसकी प्राचीनता सिद्ध होती है। उस काल में सूरसेन देश की यह राजधानी हुआ करती थी। पौराणिक साहित्य में मथुरा को अनेकों नामों से सम्बोधित किया गया है। जैसे -सूरसेन नगरी, मधुरा आदि। कृष्ण जन्मभूमि भगवान श्रीकृष्ण की जन्म स्थली है। भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ था। जन्मभूमि में राधा, कृष्ण के श्री विग्रह विराजमान है। जन्मभूमि में भगवान् जगन्नाथ और देवी सुभद्रा भगवान् बलदाऊ के साथ विराजमान हैं।

श्री द्वारकाधीश मंदिर

यह मंदिर असकुंडा घाट के समीप बाजार (मार्केट) में स्थित है। इस विशाल मंदिर का निर्माण गुजराती वैश्य श्री गोकुलदास पारिख ने सन 1814- 1815  ई. के लगभग कराया था। यहाँ सावन के महीने में हिंडोले का उत्सव होता है।और घटाओं के अति सुन्दर दर्शन होते हैं। यहाँ पर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारिकाधीश के रूप में विराजमान हैं।

इस मंदिर की एक विशेषता यह है, कि यहाँ बाहर से ले जाया गया प्रसाद भगवान् को अर्पित नहीं किया जाता है। यहाँ मंदिर की अपनी पाकशाला में ही प्रसाद बनता है।उसी का भोग द्वारिकाधीश जी महाराज को लगता है। फिर वही प्रसाद के तौर पर भक्तों को दिया जाता है।

श्री यमुना मंदिर (विश्राम घाट)

यह प्रमुख घाट मथुरा नगरी के लगभग मध्य में स्थित है। विश्राम घाट पर सायंकाल यमुना जी की आरती का दृश्य मनमोहक होता है। पुराणों के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम ने कंस का संहार करने के बाद यहाँ पर  विश्राम किया था। भाई दूज पर लाखों श्रद्धालु दूर -दूर से यहाँ आकर स्नान करते हैं।कहा जाता है ,कि इसदिन जो भाई -बहन  यहाँ आकर स्नान करते हैं वो यमलोक गमन नहीं करते हैं।

बलदेव मंदिर (श्री दाऊजी महाराज मंदिर)

बलदेव मथुरा का एक क़स्बा है। इस कस्बे का नाम भगवान् श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के नाम पर रखा गया। बलदेव में भगवान् बलराम का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण लगभग 200 वर्ष पूर्व हुआ था।  मंदिर में भगवान् बलराम और उनकी पत्नी रेवती की प्राचीन प्रतिमाएं विराजमान हैं। भगवान् बलराम की यह दुर्लभ प्रतिमा यहाँ स्थित बलभद्र कुंड से निकली थी। यहाँ पर हिंदी महीने के भाद्रपद शुक्लपक्ष की छठ को भगवान् बलराम के जन्म उत्सव के रूप में मनाया जाता है।जिसे देव छठ भी कहते हैं।

गोवर्धन

मानसी गंगा

ब्रजभूमि भगवान् श्रीकृष्ण एवं उनकी शक्ति श्री राधारानी की लीला भूमि है। गोवर्धन को परिक्रमा मार्ग के रूप में जाना जाता है। आज भी लोग ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा करने दूर -दूर से यहाँ आते हैं।शास्त्रों में यह भी कहा गया है, कि ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा करने वालों को एक -एक कदम पर अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है। साथ ही जो व्यक्ति परिक्रमा लगाता है, उसे निश्चित ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।

मथुरा का परिक्रमा मार्ग इस प्रकार है-

  1. मधुवन
  2. तालवन
  3. कुमुदवन
  4. शांतनु कुंड
  5. सतोहा
  6. काम्य वन
  7. गोवर्धन
  8. राधा -कृष्ण कुंड
  9. बहुला वन
  10. संच्दर सरोवर
  11. जतीपुरा
  12. डींग का लक्ष्मण मंदिर
  13. साक्षी गोपाल मंदिर
  14. जलमहल
  15. कामोदवन
  16. चरण पहाड़ी कुंड
  17. काम्यक वन
  18. बरसाना
  19. नंदगांव
  20. जावट
  21. कोकिलावन
  22. कोसी
  23. शेरगढ़
  24. चीरघाट
  25. नोहझील
  26. श्री भद्रवन
  27. भांडीरवन
  28. बेलवन
  29. रायावन
  30. गोपालकुण्ड
  31. कबीरकुंड
  32. भोयीकुंड
  33. वनखंडी
  34. दाऊजी
  35. महावन
  36. ब्रह्मांडघाट
  37. चिंताहरण महादेव
  38. गोकुल
  39. लोहवन

पुराणों के अनुसार यात्रा मार्ग में 12 वन, 24 उपवन, 4 कुंज, 4 निकुंज, 4 वनखंडी, 4 ओखर, 4 पोखर, 365 कुंड, 4 सरोवर, 10 कूप , 4 बाबड़ी, 4 तट, 4 वट, 5 पहाड़, 4 झूला, तथा 33 स्थल रास लीला के इसी मार्ग में पड़ते हैं।

मथुरा के प्रमुख दर्शनीय स्थल इस प्रकार हैं

  1. श्रीकृष्ण जन्मभूमि
  2. द्वारिकाधीश मंदिर
  3. विश्राम घाट
  4. जय गुरुदेव मंदिर
  5. रमणरेती
  6. चौरासी खम्बा
  7. ब्रह्मांडघाट
  8. बलदेव
  9. महावन
  10. रावल
  11. चिंताहरण महादेव
  12. भूतेश्वर महादेव
  13. रंगेश्वर महादेव
  14. गोकर्णेश्वर महादेव
  15. चन्द्रावली
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