सोलह सोमवार व्रत कथा एवं पूजन विधि- आसान भाषा में

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सोलह सोमवार के व्रत की पूजन विधि सोमवार के व्रत की तरह ही है। इस व्रत में भी दिन के तीन पहर तक व्रत रखकर दिन में केवल एक समय ही भोजन करें। इस व्रत में भगवान शिव तथा माता पार्वती का पूजन विधि पूर्वक करने के पश्चात कथा सुने तथा सभी को प्रसाद वितरण करें।

सोलह सोमवार व्रत कथा (Solah Somvar Vrat Katha in Hindi)

एक बार मृत्यु लोक में भ्रमण करने की इच्छा को लेकर भगवान भूतनाथ महादेव जी, माता पार्वती के साथ पृथ्वी पर पधारे। भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती भ्रमण करते – करते विदर्भ देशान्तर्गत अमरावती नाम की अति सुन्दर नगरी में पहुंचे। अमरावती नगरी अमरपुरी के समान सभी प्रकार के सुखों से परिपूर्ण थी। उस नगरी में वहाँ के राजा ने अति सुन्दर शिवजी का मंदिर बनवाया था। उसी मंदिर में भगवान शंकर – माता पार्वती के साथ निवास करने लगे। एक दिन माता पार्वती, भगवान शंकर को प्रसन्न देखकर बोली के “हे महाराज ! आज तो हम दोनों चोंसर खेलें“। शिवजी ने माता पार्वती की बात को मान लिया और दोनों चौंसर खेलने लगे।

उसी समय उस स्थान पर मंदिर का पुजारी पूजा करने के लिए आये। पार्वती जी ने ब्राह्मण से प्रश्न किया की पुजारी बताओ की इस बाजी में दोनों में से किसकी जीत होगी? ब्राह्मण ने बिना विचार किये ही शीघ्र बोल दिया कि शिवजी की जीत होगी, थोड़ी ही देर में बाजी समाप्त हुई और माता पार्वती की जीत हुई। अब माता पार्वती ब्राह्मण को झूठ बोलने के अपराध के कारण श्राप देने को उद्धत हुई। भगवान भोले ने माता पार्वती को बहुत समझाया परन्तु उन्होंने ब्राह्मण को कोढ़ी होने का श्राप दे दिया। कुछ समय पश्चात पार्वती जी के श्राप के कारण ब्राह्मण के शरीर में कोढ़ पैदा हो गए। अब पुजारी बहुत दुःखी रहने लगा, इस तरह जब कष्ट भोगते हुए जब पुजारी को बहुत दिन हो गए तो देवलोक की अप्सरायेँ शिवजी की पूजा करने उसी मंदिर में पहुँची, और पुजारी के कोड के कष्ट को देख बड़े दयाभाव से उससे रोगी होने का कारण पूछने लगीं। पुजारी ने निः संकोच वे सारी बातें उनसे कह दीं। तब वे अप्सरायेँ बोलीं – “हे पुजारी ! अब तुम अधिक दुःखी मत होना भगवान शिव जी तुम्हारे सभी कष्टों को दूर कर देंगे। तुम सभी व्रतों में श्रेष्ट ‘सोलह सोमवार का व्रत‘ भक्ति भाव के साथ करो तब पुजारी, अप्सराओं से हाथ जोड़कर विनम्र भाव से सोलह सोमवार व्रत की विधि पूछने लगा। अप्सरायेँ बोलीं कि सोमवार को भक्ति के साथ व्रत करें, स्वच्छ वस्त्र पहने, आधा सेर गेंहू का आटा लें, उसके तीन अंगा बनाएं ( तीन मोटी रोटी या परांठे ), घी, गुड़, दीप, नैवेद्य, पुंगीफल, बेलपत्र, जनेऊ का जोड़ा, चन्दन, अक्षत, पुष्प आदि के द्वारा भगवान का पूजन करें। तीन अंगाऔं में से एक को शिवजी को अर्पण करें, एक को शिवजी का प्रसाद समझकर उपस्थित जनों को बाँट दें, तथा बाकी बचे एक अंगे को  स्वयं खा लें। इस विधि से सोलह सोमवार व्रत करें। तत्पश्चात सत्रहवें सोमवार के दिन पाव सेर आटे की पूरी बनायें उसमें घी तथा गुड़ मिलाकर चूरमा बनाएं और शिवजी का भोग लगाकर उपस्थित जनों को बाँट दें और स्वयं भी ग्रहण करें। ऐसा करने से शिवजी की कृपा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। ऐसा कहकर अप्सरायेँ स्वर्ग को चली गयीं। ब्राह्मण ने यथा विधि सोलह सोमवार व्रत किया तथा भगवान शिव जी की कृपा से रोग मुक्त होकर आनंद से रहने लगा। कुछ दिन बाद जब फिर से शिवजी और पार्वती जी उस मंदिर में पधारे, तब ब्राह्मण को निरोग देखकर पार्वती जी ने ब्राह्मण से रोग मुक्त होने का कारण पूछा तो ब्राह्मण ने सोलह सोमवार व्रत की कथा सुनाई। तब तो पार्वती जी ने अति प्रसन्न होकर ब्राह्मण से इस व्रत को करने का उपाय पूछा और पार्वती जी ने स्वयं इस व्रत को किया। इस व्रत को करने से उनकी मनोकामना पूरी हुई और उनके रूठे हुए पुत्र स्वामी कार्तिक स्वयं माता के आज्ञाकारी हुए। परन्तु कार्तिक के मन में भी अपने विचारों में आये हुए परिवर्तन को जानने की इच्छा प्रकट हुई और माता से बोले – “हे माता जी ! आपने ऐसा कौन सा उपाय किया जिससे मेरा मन आपकी ओर आकर्षित हुआ“। तब पार्वती जी ने वही सोलह सोमवार के व्रत की कथा सुनाई।  यह सुनकर स्वामी कार्तिकेय जी बोले के माता इस व्रत को तो मैं भी करूंगा, क्योंकि मेरा प्रिय मित्र ब्राह्मण बहुत दुःखी होकर परदेश गया है। मुझे उससे मिलाने की बहुत इच्छा है। तब कार्तिकेय जी ने इस व्रत को किया और उनका प्रिय मित्र उनको मिल गया।

मित्र ने इस आकस्मिक मिलान का भेद कार्तिकेय जी से पूछा तो वे बोले “हे मित्र ! हमने तुम्हारे मिलाने की इच्छा करके सोलह सोमवार का व्रत किया था “। अब तो ब्राह्मण को भी अपने विवाह की बड़ी इच्छा हुए। कार्तिकेय से व्रत की विधि पूछी और यथा विधि व्रत किया। व्रत के प्रभाव से जब वह किसी कार्यवश विदेश गया तो वहाँ के राजा की कन्या का स्वयंवर था। राजा ने प्रण किया था कि जिस राजकुमार के गले में सब प्रकार शृंगारिन हथिनी माला डालेगी, मैं उसी के साथ अपनी पुत्री का विवाह करूंगा। शिवजी की कृपा से ब्राह्मण भी स्वयंवर देखने की इच्छा से उस राजसभा में एक ओर बैठ गया। नियत समय पर हथिनी आयी और उसने जयमाला उस ब्राह्मण के गले में डाल दी। राजा की प्रतिज्ञा के अनुसार बड़ी धूमधाम से कन्या का विवाह उस ब्राह्मण के साथ कर दिया और ब्राह्मण को बहुत सा धन और सम्मान देकर विदा किया। ब्राह्मण सुन्दर राजकन्या को पाकर सुःख से जीवन व्यतीत करने लगा।

एक दिन राजकन्या ने अपने पति से प्रश्न किया – “हे प्राणनाथ ! आपने ऐसा कौन सा भारी पुण्य किया जिसके प्रभाव से हथिनी ने सब राजकुमारों को छोड़कर आपको वरण किया “? ब्राह्मण बोला – “हे प्रिये ! मैंने अपने मित्र कार्तिकेय के कथानुसार सोलह सोमवार का व्रत किया था, जिसके प्रभाव से मुझे तुम जैसी रूपवान पत्नी की प्राप्ति हुई “। व्रत की महिमा सुनकर राजकन्या को बड़ा आश्चर्य हुआ और वह भी पुत्र की कामना करके व्रत करने लगी शिवजी की कृपा से उनके घर बहुत ही धर्मात्मा और विद्वान् पुत्र पैदा हुआ। माता – पिता दोनों उस देव पुत्र को  पाकर अति प्रसन्न हुए और उसका लालन – पालन भली प्रकार से करने लगे। जब पुत्र समझदार हुआ तो एक दिन अपनी माता से प्रश्न किया किया – ” कि माँ ! तूने ऐसा कोण का व्रत किया की तुझे मेरे जैसे पुत्र की प्राप्ति हुई “? तब माता ने पुत्र को सोलह सोमवार के व्रत की पूजन विधि बताई। पुत्र ने जब इस व्रत को सभी तरह के मनोरथ पूर्ण करने वाला सुना तो वह भी राज्याधिकार पाने की इच्छा से हर सोमवार को यथा विधि व्रत करने लगा। उसी समय एक देश के वृद्ध राजा के दूतों ने आकर उसकी राजकन्या के लिए वरण किया।  राजा ने अपनी पुत्री का विवाह ऐसे सर्वगुण संपन्न ब्राह्मण युवक के साथ करके बड़ा सुख प्राप्त किया। वृद्ध राजा के दिवंगत हो जाने पर ही यही ब्राह्मण बालक गद्दी पर बिठाया गया, क्यूँकि दिवंगत राजा के कोई पुत्र नहीं था। राज्य का अधिकारी होकर भी ब्राह्मण पुत्र सोलह सोमवार के व्रत को करता रहा। जब सत्रहवाँ सोमवार आया तो ब्राह्मण पुत्र ने अपनी पत्नी से सभी पूजन सामग्री लेकर शिवालय में चलने के लिये कहा – परन्तु राजकन्या ने उसकी आज्ञा की परवाह नहीं की और दास – दासियों द्वारा सभी सामग्री शिवालय भिजवा दी।

जब राजा ने शिवजी का पूजन समाप्त किया, तब एक आकाशवाणी हुई, “हे राजा ! अपनी इस रानी को राजमहल से निकाल दो नहीं तो तुम्हारा सर्वनाश कर देगी, वाणी सुनकर राजा के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा और तत्काल ही मंत्रणागृह में आकर अपने सभासदों को बुलाकर पूछने लगा कि हे मंत्रियों ! मुझे आज शिवजी की वाणी हुई है कि में रानी को महल से निकाल दूँ। यह सब सुनकर मंत्री आदि दुःख में डूब गए क्योंकि जिस कन्या के कारण राज मिला है, राजा उसी को निकालने का जाल रचता है, यह कैसे हो सकता है? अंत में राजा ने रानी को निकाल दिया। रानी दुःखी होकर भाग्य को कोसती हुई नगर से चली गयी।

जब रानी दूसरे नगर में पहुँची तो वहां एक बुढ़िया सूत काटकर बेचने जाती थी, वह बुढ़िया रानी की करुण दशा देखकर बोली – चल तू मेरा सूत बिकवा दे। मैं वृद्ध हूँ, भाव नहीं जानती हूँ। जब रानी ने बुढ़िया के सिर से सूत की गठरी उतार कर अपने सिर पर राखी, तो थोड़ी देर बार बहुत तेज आंधी आयी और बुढ़िया का सूत पोटली सहित उड़ गया। बेचारी बुढ़िया पछताती रह गयी और रानी को अपने साथ से दूर रहने को कह दिया। अब रानी एक तेली के घर गयी, तो तेली के सब मटके शिवजी के प्रकोप से चटक गए। ऐसी दशा देख तेली ने रानी को अपने घर से निकाल दिया। इस प्रकार राणे अत्यंत दुःखी हुई और सरिता नदी के तट पर गयी, उस सरिता नदी का सारा जल सूख गया। वन सरोवर जल की ऐसी दशा देखकर गऊ चराने वाले ग्वालों ने अपने गुसाईं जी से सारी वृथा सुनाई। गुसाईं जी ने रानी को पकड़कर लाने के लिए ग्वालों से कहा। रानी की मुख कान्ति और शरीर की शोभा को देख गुसाईं जान गए, कि अवश्य ही कोई विधि की गति की मारी कोई कुलीन अबला है। ऐसा सोचकर गुसाई जी ने रानी से कहा –  “कि पुत्री तुम मेरे आश्रम में रहोगी, मैं तुम्हें किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होने दूंगा”। यह सुनकर राणे खुश हो गयी। परन्तु रानी आश्रम में जो भोजन बनाती या जल भरकर लाती उसमें कीड़े पड़ जाते। यह देख गुसाईं जी ने रानी से पूछा – “हे बेटी तुझ पर किस देवता का प्रकोप है, जिससे तेरी ऐसी दशा हुई “?

गुसाईं जी की बात सुनकर रानी ने शिवजी की पूजा न करने जाने की बात बताई। रानी की सभी बातों को सुनकर गुसाईं जी ने रानी से सोलह सोमवार का व्रत करने के लिए कहा। गुसाईं जी की बात सुनकर रानी ने पूरे विधि – विधान के साथ सोलह सोमवार का व्रत किया और सत्रहवें पूजन के दिन व्रत के प्रभाव से राजा के हृदय में विचार उत्पन्न हुआ कि रानी को गए हुए बहुत समय व्यतीत हो गया, न जाने वह किस हाल मैं होगी। ऐसा विचार कर के राजा ने रानी को ढूंढने के लिए चारों दिशाओं में अपने दूतों को भेजा। जब दूतों ने गुसाईं जी के आश्रम में रानी को देखा तो वह रानी को अपने साथ ले जाने के लिए कहने लगे, परन्तु गुसाईं जी ने रानी को उनके साथ नहीं भेजा। महल मैं आकर दूतों ने राजा को रानी का पता बता दिया, रानी का पता पाकर राजा स्वयं रानी को लेने गुसाईं जी आश्रम पर पहुंचे। राजा ने गुसाई जी से आग्रह किया कि वह रानी को भेज दें तब गुसाईं जी ने रानी को राजा के साथ भेज दिया। गुसाईं जी की आज्ञा पाकर रानी प्रसन्न होकर राजा के साथ महल में आ गयीं। इस प्रकार राजा और रानी शिवजी की कृपा का पात्र हो राजधानी में आनंद से जीवन व्यतीत करने लगे।

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